आयुर्वेद द्वारा कर्ण पाक (Otitis media) का उपचार

आयुर्वेद द्वारा (otitis media) कर्ण पाक का उपचार

कान का दर्द छोटे बच्चों में एक आम समस्या है. बार-बार हो जाने वाली इस तकलीफ़ से बच्चे को बहुत पीड़ा होती है और वह सामान्य कार्यों में रूचि नही ले पाता. कान की यह दर्द प्रायः कान के अंदरूनी हिस्से में जलन की वजह से उत्पन्न होती है. कान में बॅक्टीरिया अथवा वाइरस के कारण संक्रमण हो जाता है जिससे कान के बीच वाले हिस्से में सूजन और दर्द का आभास होता है. प्रायः ये संक्रमण नाक अथवा गले से युस्टाशियन नलिका (Eustachian tube) के माध्यम से कान तक पहुँचता है.Ear infection ayurvedic upchaar hindi
आयुर्वेद में कर्ण पीड़ा को होने से रोकना या इसका बचाव उपचार का प्राथमिक अंग है. जिन बच्चों में यह तकलीफ़ बार-बार उत्पन्न हो जाती है, कफज़ काल के आने से पहले ही पंचकर्म विधियों द्वारा उनके गले तथा नासिका के स्रोतों की सफाई का कार्य करना चिकित्सा में निहित है. इसके पश्चात कान के प्रभावित क्षेत्र की असल चिकित्सा प्रारंभ की जाती है. आयुर्वेद के अनुसार तिक्त और कटु औषधियों के प्रयोग से कर्ण पाक से राहत मिलती है. तिक्त औषधियाँ सफाई की क्रिया प्रवीणता से कर देती है. किन्ही कृमिहर एवं पुयशोषनाशकर औषधियाँ का प्रयोग भी इस रोग के निवारण में निहित है. इनके प्रयोग से कान में फसा हुआ पुराना वॅक्स (wax), फफूंदी (fungus) युक्त मल, और अन्य कान में फसा कचरा निकल जाता है.


कर्णपाक होने के कारण एवं उनके लक्षण

यह कर्ण रोग चार प्रकार के असंतुलन से उत्पन्न होता है:
वात: इस दोष के असंतुलन से पतला तरल द्रव कान से निकलता है, कान का गंधक सूखा, कान में झनझनाहट, बहरापन.
पित्त: इस के असंतुलन से उत्पन्न कर्ण रोग में, पीले रंग के द्रव का रिसाव पाया जाता है. साथ में सूजन, जलन और लालिमा पाई जाती है, कान में फटने जैसे पीड़ा भी रोगी महसूस करता है.
कफ: सफेद, लसदार द्रव की रिसाव, सुनने में अवरोध और असामान्यता, स्थाई सूजन और हल्की दर्द.
संनिपाताज: वात, पित्त और कफ तीनों के असंतुलन से यह अवस्था निर्मित होती है और कान से निकलने वाले द्रव का रंग प्रधान दोष पर निर्भर करता है.otitis media ear ache ayurvedic treatment hindi बच्चों में यह रोग अधिक पाया जाता है क्योंकि ये उनके जीवन का कफज़ काल है. इसलिए जिन बच्चों की प्रकृति प्रधान रूप से कफ है, उन्हें ख़ासकर कफ शांत करने वाले लेस-रहित भोजन पदार्थ देने चाहिए. वसंत ऋतु के आगमन से पहले पंचकर्म द्वारा गले और नाक के स्रोतों की सफाई करनी चाहिए.
विरेचन की क्रिया करने से आँतों की सफाई होती है और इनमें मौजूद पुराने टॉक्सिन्स, स्ँक्रामक जीवाणु शरीर से निकल जाते हैं.
यह क्रिया चिकत्सकीय दिशानिर्देश में की जानी चाहिए. विरेचन करने से पहले गाय के घृत द्वारा स्नेहन करना आवश्यक है. स्नेहन की क्रिया में घृत को धीरे- धीरे पिया जाता है. इससे आँतों में जमा मल आसानी से छूटने लगता है और विरेचन करने पर नर्माई द्वारा आँतों से निकल जाता है. विरेचक का दुष्प्रभाव आँतों की परत पर नही आता.
इसके साथ-साथ नास्य की क्रिया भी की जाती है.
स्नेहन में घृत को चार दिन तक सुबह-सुबह लिया जाता है. पहले दिन २ चम्मच, तत्पश्चात 4, फिर 6 और आख़िरी दिन 8 चम्मच घृत का सेवन करना चाहिए. यदि घी सीधा पीने से वमन हो तो गर्म पानी में नींबू और अदरक का रस मिलकर घृत के उपरांत पीजिए. घी के साथ गर्म पानी अथवा आधा गिलास दूध पीना हितकर है. हर आधे घंटे में गर्म पानी के घूँट भरना स्नेहन की विधि में सहायक है. दिन में चिकित्सक के परामर्शानुसार बहुत हल्का सुपाच्य भोजन ही लेना चाहिए.

अरिंड के तेल द्वारा विरेचन: यह क्रिया करने से पहले रात्रि का भोजन हल्का लेना चाहिए. सिर्फ़ मूँग की दाल लेना सहायक रहता है. 6 चम्मच अरिंड का तेल आधा कप गर्म पानी में डाल लें उसमें पहले से निकाला हुआ ताज़ा 1 संतरे या नींबू का रस मिलाएँ और जल्दी से गटक लें. यह पी लेने के बाद थोड़ा और संतरे का रस पी लें. इससे भोजन नलिका में विरेचक नीचे चला जाता है और इसकी गंध से परेशानी महसूस नही होती. विरेचन के पहले गर्म पानी से स्नान करना हितकर है. विरेचन के पहले गर्म पानी से स्नान करना हितकर है. 4-6 घंटे के बाद इसका असर हो जाता है. परंतु कईयों में 1 घंटे बाद ही विरेचन शुरू हो जाता है और कुछ में 15 घंटे भी लग सकते हैं. इसके पश्चात धारा, अभ्यंग तथा नास्य की क्रिया की जाती है. तत्पश्चात व्यक्ति गर्म पानी से स्नान करता है.

वातज कर्ण पीड़ा : लहसुन से सिद्ध किया तेल और बराबर मात्रा में अदरक का रस लेकर उसमें 5 प्रति शत सेंधा नमक मिलाएँ (95 मिलीलीटेर में 5 ग्राम सेंधा). इस मिश्रण के 2 बड़े चम्मच में बराबार मात्रा में अरिंड का तेल मिल लें. यह औषधीय तेल के 10 बिंदु दोनो कानो में दिन में तीन बार डालें. जिन्हे कर्ण पाद होता ही रहता है उन्हे सर्दियों में हफ्ते में 1-2 बार यह प्रयोग करना चाहिए. यदि बुखार भी हो तो तुलसी के पत्तों का काढ़ा पीना चाहिए. त्रिकटु चूर्ण शहद में मिलकर लेना भी लाभदायक है. साथ ही नास्य की क्रिया दिन में तीन बार चिकित्सक के परामर्शानुसार करनी चाहिए.
पित्तज़ कर्णपाद: नीम तेल और अदरक के रस को बराबर में लेकर मिश्रण बनाएँ. इसे बराबर मात्रा अरिंड के तेल में घोल लें. 10 बूँद रोज़ तीन बार दोनो कानों में डालें. बुखार का उपाय करने के लिए महासुदर्शन, नीम और कुटकी सहायक औषधियाँ हैं.
ठंडक देने के लिए गले के पीछे के हिस्से तथा कंधों पर चंदन और नीम तेल से हल्की मालिश करें.
कफज़ कर्णपाद तेल: अदरक और लहसुन का रस बराबर मात्रा में लेकर उसे उतने ही सरसों के तेल में मिला लें. इस मिश्रण में आधा हिस्सा शहद और एक चौथाई हिस्सा सेंधा नमक अच्छी तरह मिलाएँ. अब इस मिश्रण के दस हिस्सों में 10 हिस्से अरिंड का तेल मिला लें. इस तेल के 10 बूँद दोनो कान में दिन में 10 बार डालें.
सीतोपालदी चूर्ण को शहद के साथ के चाटना बुखार और अन्य परेशानी से मुक्ति प्रदान करता है. यदि रोग अत्यंत गंभीर है तो आधा चम्मच सीतोपालदी और इतना ही त्रिकटु शहद में मिलकर लेने से रोगी को लाभ मिलता है.
यदि किसी योग्य प्रशिक्षक से नेती की क्रिया सीखी जाए तो यह अत्यंत हितकारी है. परंतु जब रोग मौजूद हो तब इसे बहुत ध्यान से करना चाहिए और प्रशिक्षक के नियंत्रण में ही करें. अन्यथा पानी यदि कान में चला गया तो दिक्क्त बढ़ सकती है.


पथ्यापाथ्य  (Diet In Otitis Media)

पथ्य : कफ को शांत करने वाला हल्का सुपाच्य भोजन ही लें. छिलके वाले अन्न का ही इस्तेमाल करना चाहिए. चावल, आलू , भिंडी, केला अपथ्य्कर हैं क्योंकि इनसे शेलशमा अधिक बनती है. हरी मूँग या पीली मूँग और लाल मसरी की दाल ही रोगी को लेनी चाहिए. हरी पत्तेदार सब्जियाँ पकाकर लें (सलाद के रूप में नही), कद्दू, तोराई, परवल, गाजर, टमाटर, मूली को पकाकर सेवन करें.
नारियल तेल का सेवन नही करना चाहिए. अन्य तेल या शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल कर सकते हैं. काली मिर्च, अदरक, हल्दी, दालचीनी, ये सब मसालों में पथ्यकर हैं. हल्का नींबू का रस भी सेवन करने योग्य है, अंगूर, अनार, पपीता, अमरूद सेब भी पथ्यकर आहार हैं. बादाम को भिगोकर खाना भी हितकारी है.


कर्ण पाद में प्रयुक्त आयुर्वेदिक औषधियाँ

  • मधुकड़ी तेल करणपीचू
  • रास्णादी गुग्गुलु
    इन औषधियों में रुक्ष, लघु, तीक्ष्ण गुण पाया जाता है जिससे कफ का शोषण होता है, लघु गुण द्वारा किसी भी प्रकार की सूजन या चोट को आराम आने लगता है. तीक्ष्ण गुण के कारण ये सब शीघ्रता से होता है तथा वात एवं कफ दोष का निवारण भी हो जाता है.herbs in ear ache ayurved hindi
  • गिलोय और बागरा: ये दोनो औषधीय गुणों वाले वनस्पति का उपयोग आयुर्वेदीय औषधियों में पाया जाता है. बागरा का इस्तेमाल घरेलू उपचार विधि में प्रचलित ही है.
    इसके अलावा यदि कुछ ना हो पा रहा हो तो तुलसी के पत्तों का रस निकालकर उसकी 3-4 बूँद कान में रोज़ तीन बार डालनी लाभदायक है.
    नोट: उचित उपचार आयुर्वेदचार्य की सलाह से पूर्णरूपेण ही करना चाहिए. इससे ना केवल कर्णपाद से निजात मिलेगी अपितु दीर्घ काल में स्वास्थ लाभ भी प्राप्त होगा.