मधुमेह (Diabetes) का आयुर्वेदिक उपचार

मधुमेह (Diabetes In Hindi)

डाइयबिटीस या प्रमेह का रोग संसार भर में बढ़ता जा रहा है. प्रमेह अथवा मधुमेह धातु क्षय करने वाला रोग है जिसमें रोगी के रक्त में शुगर या ग्लूकोस की मात्रा सामान्य से बढ़ जाती है. इस व्याधि का प्रमुख लक्षण यह है कि इसमें रोगी के पेशाब में ग्लूकोस पाया जाता है. diabetes hindi
इस रोग को आयुर्वेद में महरोग भी कहा जाता है क्योंकि इस रोग में शरीर के हर अंग-प्रत्यंग पर प्रभाव पड़ता है. यही नही अपितु शरीर की हर कोशिका इस रोग से प्रभावित होती है. आयुर्वेद के आचार्यों के अनुसार यह रोग मनुष्य के पाँचों कोषों अर्थात अन्न्मय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष तथा आनंदमय कोष, इनको भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है.


मधुमेह के विभिन्न प्रकार व उनका कारण (Types and Causes of Diabetes in Ayurveda- Hindi)

आयुर्वेद के अनुसार प्रमेह के 21 प्रकार होते हैं जिसमे से 10 प्रकार कफ की विकृति के कारण उत्पन्न होते हैं, 6 पित्त की विकृति से एवम 4 वात दोष की विकृति से उत्पन्न होते हैं. जुवेनाइल डाइयबिटीस (juvenile diabetes) या बच्चों में पाई जाने वाली जन्मजात प्रमेह का कारण माता-पिता द्वारा किये गये निषिद्ध कर्मों का परिणाम भी हो सकती है, यह वर्णन भी आयुर्वेद में किन्ही ग्रंथों में पाया जाता है.
परंतु प्रमेह का जो मुख्य कारण है वह है जीवन शैली में व्यायाम की कमी और अधिक गुरु, स्निगध और उष्ण भोजन का आवश्‍यकता से अधिक सेवन.cardiovascular disease1 hindi
प्रमेह की उत्पत्ति के कारण के अनुसार यह रोग दो प्रकार में विभक्त है-

१) सहज प्रमेह (बिना किसी बाहरी कारण के उत्पन्न हो)

२) अपथ्यनिमित्तज (ग़लत खानपान के कारण उत्पन्न)

आयुर्वेद अनुसार यह एक त्रिदोषज व्याधि है जिसके कारण इसे वातज, पित्तज या कफज प्रमेह भी कहा जा सकता है.
आम तौर पर इसे दोष की प्रधानता के अनुसार इंगित करते हैं. यह कफज़, पित्तज, वातज, कफपित्तज, वातकफज, पित्तवातज हो सकता है. इसके अलावा यह रोग तीनों दोषों के प्रादुर्भाव से उत्पन्न वात-पित्त-कफज भी हो सकता है.
संनिपात, केवल वातज या पित्त-वातज को Type 1 डाइयबिटीस भी कह सकते हैं. इसके अलवा बाकी सब प्रकार की मधुमेह Type 2 डायबीटीज़ की श्रेणी में आती है.
प्रमेह के लक्षण विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं. पित्तज दोष के कारण उत्पन्न रोग में अधिक पसीना आना, शरीर से बदबू आना, इस प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं. इसके अलावा अन्य पित्त-संबंधी लक्षण जैसे नाखूनों और बालोँ का सामान्य से अधिक तेज़ी से बढ़ना, मुख और गले का सूखना और मुख में मधुर स्वाद का आना आयुर्वेद में  वर्णित हैं. वात दोष की प्रधानता में अंगों में शिथिलता पाई जाती है. रोगी को आलस्य, प्रमाद, अंगों में भारीपन तथा हृदय में भारीपन का अनुभव होता है .


सुश्रुत द्वारा प्रामे रोग का वर्णन (Sushruta’s Description on Diabetes- Hindi)

सुश्रुत के अनुसार दोष की प्रधानता इस रोग की अभिवृद्धि की निर्धारक हैं.
कफ प्रधान दोष में रोगी को अधिक नींद का आना, भूख का ना लगना, अपच, वमन, खाँसी और बहती नाक का होना, ये सभी लक्षण दिखाई पड़ते हैं.
पित्तज दोष में पेशाब में जलन, शरीर में ताप, अधिक प्यास लगना, अम्ल (acidity), चक्कर आना, अनिद्रा, हृदय में जलन जबकि वातज कफ में उपर की ओर वात का वेग, शरीर में कंपन, शुष्कता, हृदय में जकड़न, श्वास लेने में कष्ट का अनुभव इत्यादि लक्षण पाए जाते हैं.


चरक द्वारा मधुमेह का वर्गीकरण (Charaka’s Classification In Hindi)

चरक के अनुसार प्रमेह तीन प्रकार का है- साध्य, यप्य और असाध्य.

साध्य प्रमेह (Curable stage): बीमारी का प्रारंभिक रूप जिसमें व्यक्ति रोग को प्रारंभिक रूप में ही पकड़ लेता है एवं इसे नियंत्रित करने के यथासंभव उपाय कर लेता है. इस श्रेणी में रोगियों का वजन आवश्कता से अधिक बढ़ा हुआ होता है और यह अधिक तला तथा गरिष्ट भोजन खाने के कारण होता है.

यप्य प्रमेह (Partially curable stage): इस प्रकार के प्रमेह के रोगियों में पित्तज तथा कफाज़ प्रमेह पाया जाता है. यह अवस्था इलाज द्वारा नियंत्रण में रखी जा सकती है.

असाध्य प्रमेह (Stubborn or Incurable stage): असाध्य प्रमेह में व्याधि लाइलाज रूप धारण कर लेती है. प्रमेह रोगी के शरीर में ओजस की मात्रा लगातार घटती जाती है क्योंकि सभी नवद्वारो से इसका रिसाव होता है ख़ासकर पेशाब एवम पसीने द्वारा.

प्रमेह के कारण रक्त धमनियों के अवरोध और धातुक्षय उत्पन्न होता है जिससे हृदय और तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जिसके कारण ओजस में असंतुलन उत्पन्न होता है.


मधुमेह का उपचार (Treatment of Diabetes in Ayurveda-Hindi)

प्रमेह की चिकित्सा के लिए मुख्य रूप से रोगी के शरीर की संरचना, प्रधान दोष, रोग संबंधित जटिलतायें (complications) जैसे कि रक्त धमनियों का अवरोधित हो जाना – इन सब कारकों का मूल्यांकन किया जाता है. इसके अलावा रोगी की मनोदशा और उसके आहार-विहार का प्रभाव भी प्रमेह की गंभीरता को निश्चित करता है. आनुवांशिक कारणों (परिवार के सदस्यों में रोग का होना- genetic factors) से भी प्रमेह का रोग होने की संभावना बढ़ती है परंतु यह ग़लत ख़ान-पान से ही वास्तव में रोग का रूप लेती है. यद्यपि मधुमेह का उपचार आयुर्वेदचार्य की देख-रेख में ही होना चाहिए परंतु खानपान में सुधार और नियमित व्यायाम करना, इसका ध्यान रोगी को स्वयं रखना चाहिए. इस रोग के वातज प्रकोप में भरिम्हन उपचार विधि अत्यंत लाभकारी सिद्ध होती है.
विजयसार की छाल का औषधीय प्रयोग किया जाता है. इस औषधि का रस तिक्त और कशाय है तथा गुण लघु एवम रुक्ष है. यह कटु विपाक और शीत वीर्य  है जो प्रमेहग्न रोगों (अर्थात वे सभी रोग जिनमें मूत्र का रंग सामान्य से विकृत हो जाता है) के उपचार में अति लाभदायक है. Vijaysar hindi
विजयसार रकतशोधक रसायन भी है जो धातुक्षय को दूर कर कोशिकायों को पुष्ट करता है. इसके अलावा यह कृमिरोगहर (anthelminthic) यानि कि पेट के कीड़े भी खत्म करती है.
इसके अलावा आयुर्वेद में अनेक औषधियों का वर्णन है जो कि मधुमेह का उपचार सफ़तलता पूर्वक करने में सक्षम हैं.

प्रमेह रोग उपचार में विभिन्न पहलूयों पर ध्यान देना चाहिए जिनमें शारीरिक व्यायाम, पथ्य, पंचकर्म एवम औषधि प्रयोग महत्वपूर्ण हैं. इस रोग के उपचार में तिक्त, कशाय व कटु औषधियों का प्रयोग निहित है जिनसे ना केवल रक्त में मौजूद ग्लूकोस की मात्रा कम होती है अपितु डाइयबिटीस रोग का जड़ से विमोचन भी होता है. पथ्य-अपथ्य का विशेष ध्यान रखना इस रोग के उपचार तथा नियंत्रण के लिए परम आवश्यक है.

व्यायाम तथा योगासन: किसी भी प्रकार का शारीरिक व्यायाम अथवा योगासन इस रोग के उपचार में सहायक हैं. मंडूकासन, पस्चिमोत्तनसन, विपरीतकरणी, हलासन तथा अन्य आसन एवम नाड़ी शोधन प्राणायाम जब नित्य रूप से किए जायें तो प्रमेह के उपचार में बहुत सहायता देते हैं.
सावधानी: योगासनों को किसी समझदार योगचर्य से सीखकर अथवा उनके दिशानिर्देश में ही करें. किताब या अन्य सोशियल मीडीया से देखकर योगासन का अभ्यास ना करें.yogasan for diabetes hindi


मधुमेह के नियंत्रण में उपयोगी जड़ी-बूटियाँ (Herbs Used For Control of Diabetes-Hindi)

अब हम वर्णन करेगें उन हर्बल औषधियाँ जिन्हें प्रयोग द्वारा उपचार तथा रोग नियंत्रण किया जाता है:

जामुन बीज चूर्ण (Eugenia jambolanum) : जामुन के सूखे हुए बीजों का चूर्ण दिन में 2-3 बार कुनकुने पानी के साथ लेने से लाभ मिलता है.

गुडमार पत्र चूर्ण (Gymnema sylvestre)एक चम्मच गुडमार के सूखे पत्तों का चूर्ण गुनगुने पानी केसाथ लेने से रोग के उपचार मी लाभ मिलता है. इस औषधि के सेवन से मुख में फीकापन या मीठा स्वाद निर्मित हो सकता है जो पौने-क घंटे तक सामप्त हो जाता है.

विजयसार (Pterocarpus marsupium) : किनो ट्री की छाल का चूर्ण क्यूब्स के रूप में उपलब्ध हो जाता है. यदि एक क्यूब को रात भर भिगो कर रखा जाए और उस जल का सेवन प्रातः खाली पेट किया जाए तो प्रमेह में निसचीत लाभ मिलता है.

न्यगरोधात्वक चूर्ण  (Ficus bengalensis): बरगद के पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से भी इस रोग मेी सुधार आता है. 25-30 ग बरगद के पेड़ की छाल 900 मिली पानी  मेी तब तक उबालें जब तक घटकर एक-चौथायी बच जाए. इस काढ़े को छान लें और रोज़ 40-50 मिली सेवन करें.Diabetes home remedies

शिलाजीत (Rock Salt): शुद्ध शिलाजीत जिसे हिमालयन राक सॉल्ट भी कहा जाता है , ग्रॅन्युल्स या चूर्ण के रूप में प्राप्त हो जाता है तथा मधुमेह के कारण उत्पन्न कमज़ोरी को नियंत्रित करने में बहुत सहायक है.

तेजपत्र (Cinnamomum tamal). यह नित्य प्रयोग होने वाला मसाला भी है जो भारतीय व्यंजनों मेी उपयोग होता है. मधुमेह के रोगियों को विशेषकर तेजपत्र का प्रयोग अपने खाने में करना चाहिए.

मेथी दाना (Fenugreek seeds):  एक चम्मच मेथी के दाने गिलास पानी में रत भर भिगोकर रखकर सुबह में उनका पानी पीना चाहिए. मेथी का पाउडर बनाकर गेहूँ के आटे में गूंद लें और इसी की रोटियाँ सेकें. इस प्रयोग से निश्चित लाभ मिलता है.

करेले का रस (Momordica charantia) :  20 मिली करेले का जूस हर रोज़ लेने से सुबह लेने से रोगी को लाभ मिलता है.  1/2 से एक चम्मच करेले का सूखा पाउडर रोज़ सेवन करने से भी  रोग में सुधार आता है.

अमला (Emblica officinalis): 20 मिली ताज़ा अमला का जूस प्रतिदिन लेने से रोग में निसचीत लाभ मिलता है. अमला का चूर्ण दिन में दो बार लेने से भी रोग-निवारण में सहयता करता है.

हरिद्रा (हल्दी) (Curcuma longa):  हल्दी का सेवन अमला के रस के साथ अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है. हल्दी को दूध के साथ भी सेवन कर सकते हैं.

चिरायता:  चिरायते को पानी में उबालकर नित्यप्रति लेने से मधुमेह के रोग में बहुत लाभ मिलता है. इसके अलावा यह विभिंन प्रकार के चर्म रोगों में भी लाभप्रद औषधि है.


मधुमेह  के उपचार हेतु औषधि प्रयोग (Ayurvedic medicines used to cure Diabetes- Hindi)

किन्हीं रोगियों में रोगमारक औषधियों, यहाँ तक कि इंसुलिन का भी लाभ नहीं हो पाता, ऐसे रोगियों में अयुर्वेदचार्य सहयाक प्रमेह्नाशक औषधियाँ देकर रोग के उपचार को सफलतापूर्वक कर लेते हैं. इस प्रकार न केवल मधुमेह से होने वाली कमज़ोरी और क्षय को ख़त्म किया जा सकता है अपितु इससे अन्य जटिल समस्यायों को उत्पन्न होने से भी रोका जा सकता है.

मधूविजय कॅप्सुल्स: 500 मिलीग्राम कॅप्सुल का सेवन यदि विजयसार के काढ़े के साथ किया जाए तो अत्यंत जीर्ण और तनावग्रस्त रोगियों में भी लाभ पाया जाता है.

चंद्रप्रभा वॅटी : 500 मिलीग्राम वॅटी दिन में दो या तीन बार लेने से महिलयों को बहुत लाभ मिलता है. यदि यह वॅटी गोक्शुरादी चूर्ण के साथ दी जाए तो महिलयों को स्वेत्प्रदर रोग में भी आराम मिलता है.

त्रिभंग भस्म : तीन भस्मों ( नाग, वांग, यशाहा) के योग से बनी इस भस्म के 125 मिलीग्राम को लेने से पुरुषों में अधिक पेशाब लगना, कमज़ोरी से छुटकारा मिलता है.

धात्री निशा: हल्दी एवम अमला रस के मिश्रण से बनी यह औषधि diabetic eye की समस्या को उत्पन्न होने से रोकती है.

वसंत कुसूमकर रस: 125 मिलीग्राम वसंत कुसूमकर रस का सेवन दिन में दो बार मधुमेह से उत्पन्न होने वाली जटिल समस्याओं को रोकने में समर्थ है.
इनके अलावा आरोग्यवर्धिनि वॅटी, मॅम्जॅक्का घन वॅटी, जांबवास्वा, पथ्यक्श्यदित्रय कशाय, पंचनिंबा चूर्ण आदि औषधियाँ भी मधुमेह के उपचार में प्रयोग होती हैं.


मधुमेह रोगियों के लिए पथ्य आहार (Diet recommended for Diabetics)

शिगृु, हरिद्रा, अमलकी  (gooseberry), Shyamaka-Setaria italica (L.) Beau., Kodrava- Paspalum scrobiculatum,Linn, जौ (barley), गेहूँ (wheat), मूँग (green gram), कुल्थि (horse gram), चिचिंडा (snake-gourd), करेला (bitter-gourd), मरीचा (black pepper), लहसुन (garlic), जंबू (blueberry)diet for diabetics hindi


 मधुमेह रोगियों के लिए अपथ्य आहार (Diet not recommended for diabetics)

कंद- मूल (root-rhizome), गन्ने का रस (sugarcane juice), तैल (oil), घृत (ghee),  गुड़ (jaggery), कांजीका/शुकता (sour beverages), मद्या (alcohol),  ब्रेड, पिज़्ज़ा, बर्गर (carbohydrate rich foods), अनुपामंसा (lean meat and fish),  दही (curd), नवन्ना (new grains).

रोगी को दिन में शयन नही करना चाहिए  (दिवास्वप्ना  वर्जित).