Ayurveda In Hindi

गर्भ संस्कार

गर्भ संस्कार (Garbha Sanskar In Hindi)

भारतीय संस्कृति के अनुसार, संतान को उत्पन्न करना एक प्राकृतिक घटना ही नही अपितु यह होने वाले अभिभावकों के लए अत्यंत महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है. इसलिए गर्भ धारण करना और एक नवीन जीवात्मा को संसार में लाने का पूर्ण विधान दिया गया है.
सनातन संस्कृति के अनुसार 16 संस्कारों में से गर्भ संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण है. यदि कोई माता-पिता संतान चाहते हैं तो उन्हें कम-से-कम तीन माह पूर्व से ही मानसिक, बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयं को इस घटना के लिए तैयार करना चाहिए. शरीर का स्वास्थ, मानसिक संतुलन ना होने पर उत्पन्न होने वाली संतान अनेक रोगों से ग्रस्त होती है.
आजकल बच्चों में जन्म से ही कितनी बीमारियाँ पाई जाती है, उसका कारण यही है की व्यक्ति अपने जीवन में घटने वाली इस विशेष घटना के लिए ज़रा भी तैयारी नही करते और गर्भ धारण बिना किसी जागरूकता के एक दुर्घटना के रूप में होता है. वास्तव में तो यह इतना गंभीर और विस्तृत विषय है कि इसमें गर्भ धारण का काल, स्थान और उसके पूर्व की गयी साधना का भी अत्यंत महत्व है परंतु इस लेख में हम केवल आयुर्वेदीय पक्ष पर ही विचार करेंगे.
आयुर्वेद में सुप्रज ज्ञान का वर्णन आता है जिसके अनुसार संतान के इच्छुक माता-पिता दोनों ही शारीरिक, मानसिक एवं अध्यात्मिक रूप से इसके लिए तैयारी करते हैं. वास्तव में गर्भ धारण के पश्‍चात माता का उत्तरदायित्व शिशु के प्रति पिता से अधिक होता है क्योंकि संतान का भ्रूण उनके शरीर में पलता है. इसलिए गर्भ-संस्कार का प्रावधान बनाया गया है जिसमे माता को इस प्रकार की शिक्षा दी जाती है जिससे वह एक स्वस्थ, तेजस्वी और योग्य बालक को इस धरा पर ला सके.
GARBHA SANSKAR AYURVEDA HINDI
सुप्रज ज्ञान की शुरुआत पिंड शुद्धि अथवा अंडकोष एवं शुक्राणु की शुद्धीकरण द्वारा होती है. यदि माता अथवा पिता दोनों अथवा दोनों में से कोई एक मानसिक रूप से शांत एवं प्रसन्न नहीं है तो भी गर्भधारण नहीं करना चाहिए. क्योंकि माता-पिता की मानसिक अवस्था का प्रभाव भी आने वाली संतान के स्वास्थ्य और स्वाभाव पर पड़ता है.
वास्तव में होने वाले माता-पिता को अपने मन में सत्व गुण की अभिवृद्धि के लिए साधन करने चाहिए. इसके लिए अन्य कारणों के साथ सात्विक आहार एवं उचित दिनचर्या का बड़ा महत्व है.
तीखे, मसालेदार भोजन और मादक पदार्थों का सेवन नही करना चाहिए.
यह तो अब सर्वविदित सत्य है कि गर्भ में पल रहा शिशु मात्र माँस का टुकड़ा नहीं होता अपितु वह एक पूर्ण जीता-जागता अलग व्यक्तित्व है जो उसके आसपास की हर घटना और संवेदना को महसूस भी करता है, उससे प्रभावित भी होता है एवं वह अपना प्रतिक्रिया भी व्यक्त करता है.
इसका अर्थ यह हुआ की माता-पिता की ज़िम्मेवारी बन जाती है की गर्भित शिशु को उचित, प्रसन्नतापूर्ण ध्वनियाँ और मंगलमय कर्मों से भरा वातावरण प्रदान किया जाए. कुछ समय बाद शिशु के साथ संपर्क भी स्थापित किया जाता है. आयुर्वेद में गर्भधारण किए हुई स्त्री के लिए निर्धारित जीवनचर्या प्रदान की गयी है.
उन्हें ख़ास पुष्टिदायक भोजन के अलावा, योग एवं मंत्र जप तथा निर्धारित विशिष्ट जीवनचर्या का पालन करना चाहिए. माता द्वारा सुनी हुई ध्वनि का प्रभाव शिशु के मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ता है. इसलिए विशिष्ट गर्भ-संस्कार संगीत को सुनना एवं मंत्र उच्चारण गर्भवती महिला को अवश्य करना चाहिए. उन्हें विशेष प्रकार के साहित्य एवं पुस्तकों को भी पढ़ना चाहिए.


माता-पिता एवं शिशु के बीच संबंध (Parent-Child Relation: Ayurvedic View In Hindi)

ध्यान, धारणा, विचार-सम्मोहन, कल्पनाशक्ति के प्रयोग द्वारा कुछ विधियों को किया जाता है जिससे शिशु द्वारा संपर्क बनाया जाता है. सबसे महत्वपूर्ण है की शिशु तक शुभ भावनायो और संस्कारों का संचार होना चाहिए. सफेद रंग की रौशनी पर धारणा बहुत लाभदायक प्रयोग है. विचारों को शिशु तक पहुँचाने की कीमिया को समझना चाहिए.
PARENTS role ayurveda hindi pregnancyजब कोई बात बिना कहे मन में धारण की जाए तो उस विचार की शक्ति सबसे अधिक इसी रूप में होती है. इसी प्रकार हम शुभ संस्कारों को शिशु तक पहुँचा सकते हैं. यदि ये विचार शुभ, कल्याणकारी और निस्वार्थ हों तो इनका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ कर शिशु तक पहुँच जाता है.


संगीत का प्रभाव (Effect Of Music On Unborn Child Ayurveda Hindi)

सबसे अधिक प्रभावशाली साधन जो गर्भ संस्कार में उपयोगी सिद्ध होता है वह है संगीत. माता की हृदय की धड़कन को शिशु निरंतर सुनता है, इसलिए जन्म के पश्चात भी उसे माँ के हृदय के पास सबसे सुरक्षित महसूस होता है. संगीत में मस्तिष्क को प्रभावित करने की अद्भुत क्षमता है. विशिष्ट प्रकार के संगीत से शिशु के लाभदायक और उसके विकास के लिए सहायक योगदान मिलता है.

वीणा, बाँसुरी और साम वेद के मंत्रों के उच्चारण से माता और शिशु दोनों को लाभ मिलता है.


माता की जीवनचर्या (Preagnant Mother’s Routine As Per Ayurveda In Hindi)

गर्भवती स्त्री को भयानक दृश्य और ध्वनि वाली फिल्में, टेलीविज़न सीरियल नहीं देखने चाहिए. प्रीतिकार और मधुर संगति में रहना चाहिए. सुंदर कलाकृतियों, प्राकृतिक दृश्यों तथा अच्छे साहित्य को पढ़ना शिशु पर अच्छा प्रभाव देता है.
दो प्रकार के घृत का प्रयोग गर्भवती माता को कराया जाता है. गर्भधारण के चौथे और पाँचवे माह में कल्याणक घृत का सेवन स्त्री को करना चाहिए, इससे शिशु के अंगों के विकास में सहायता मिलती है और नवजात शिशु में बीमारियाँ उत्पन्न नहीं होती.
तंकन घृत का प्रयोग छठे, सातवें और नवें माह में किया जाता है, ये शिशु के लिए लाभप्रद है, माता को रक्त की कमी से बचाने वाली औषधि है. इससे गर्भ के अंत में शिशु के जन्म में भी सहायता मिलती है.


नवजात शिशु के लिए नित्य की जाने वाली प्रार्थना (Prayer For Parents And Child In Garbha Sanskara Ayurveda In Hindi)

सत्य स्वरूप परमात्मा के चरणों में प्रार्थना है. हर जीव अपने ही कर्म की गति के अनुसार अपने प्रारब्ध को भोगता है, जिस कार्मिक बंधन से हम तीनों का संबंध जुड़ा है उसके द्वारा हम इस शिशु की उन्नति और आत्म जागरण के लिए प्रार्थना करते हैं. हम उसके चुने हुए मार्ग में अवरोध नही करते और उसके कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं.
हे शिशु, आपका यहाँ पर स्वागत है. इस धारा पर आप एक जागृत, सशक्त जीवन का रस लें. यदि आपकी इच्छा हो तो ….. (जो गुण माता-पिता अपनी संतान में लाना चाहते हैं) इन गुणों को धारण कर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होइए. तुम्हारे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हम तुम्हारे संकेत तुम्हें याथायोग्य साधन उपलब्ध करावेंगे. हे बालक, आपके द्वारा इस लोक में देश, समाज का कल्याण हो और आपका भी अत्यंत मंगल हो, यह कामना हम अभिभावक आपके लिए करते हैं.

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